>हमारा घर (राजस्थान) कैसे चलता है?

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अपने ड्राईंग रूम, चौपाल या विभिन्न मंचों पर बुद्धिजीवी शासन व्यवस्था पर चर्चा करते रहते हैं। अखबारों में छपी आधी-अधूरी जानकारियों से ये चर्चाएँ सारोबार रहती हैं। शासन में बैठे लोगों द्वारा मेनेज्डइन जानकारियों से भ्रमित वातावरण का निर्माण हो जाता है और लगभग सभी लोग उस भ्रम में डूबते नजर आते हैं। कभी उन्हें अशोक गहलोत की जादूगरीका भ्रम होता है, तो कभी वसुन्धरा राजे के चमत्कारनजर आने लगता है। ऐसा ही है न। 60 वर्ष का हो जाने पर हम किसी नागरिक से बात की गहरी समझ की अपेक्षा करते हैं। तो क्या हमारे 60 वर्षीय लोकतान्त्रिक जनमानस से हमें ऐसी अपेक्षा नहीं होनी चाहिए कि वह कम से कम हमारी अर्थव्यवस्था की कुछ आधारभूत जानकारियाँ रखे। फिर इन्हें समझे और शासन व्यवस्था के प्रति अपना विचार बनाये। तब इस पर बोले। शायद हमारे प्रदेश और देश के विकास की दिशा में यह एक सार्थक कदम होगा। यह जिम्मेदारी की पहचान होगी, नागरिकता का अहसास होगा।
         

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