>धारणाएँ बदलें, ताकि समाधान निकले 1

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कहते हैं कि लोकतंत्र में तथ्यों से अधिक धारणाएँ महत्वपूर्ण हो जाती हैं। मानवीय स्वभाव गणित के नियमों से परे होता है। आसपास के वातावरण से कई बार हम इतने प्रभावित हो जाते हैं, जैसे खोपड़ी में बसा दिमाग केवल भावनाओं से चलने वाला चुम्बक मात्र है। ऐसे में धारणाओं के इस खेल को समझना किसी भी युग के नीति निर्धारकों व चिंतकों के लिए आवश्यक होता है। क्योंकि गलत धारणाएँ अकसर समाधान में सबसे बड़ी बाधक होती हैं। मान लीजिये कि कोई बेकार बैठा आलसी व्यक्ति अपनी कमजोरी के लिए अपने आसपास के लोगों को दोषी ठहराता रहे, तो आप क्या कहेंगे? यही न कि अपने भीतर झाँको, उठो और काम करो। यही न। तो लीजिये यहाँ हम ऐसी ही कुछ धारणाओं पर विचार करते हैं, ताकि समाधान की दिशा में चिंतन मुड़ सके। अभिनव राजस्थान और अभिनव भारत बन सके।
जनसंख्या की समस्या अकसर यह कहा जाता है कि भारत में अधिक जनसंख्या एक बड़ी समस्या है। तर्कशास्त्री तो इसे सभी समस्याओं की जड़ बता देते हैं। जबकि होना तो यह चाहिये कि इस शब्द को हम जनशक्तिकहें। हम संख्या मात्र नहीं है, चलते-फिरते सोचने वाले लोग हैं। यह अलग बात हे कि हमारी जनशक्ति के उपयोग का वातावरण हमारे नेतृत्व द्वारा नहीं बन पाया है। उस अक्षमता को छिपाने के लिए जनसंख्याको ही समस्या बता दिया गया है। जबकि चीन ने अपनी जनशक्ति को पूँजी बनाकर उपयोग में लिया है और उसी की ताकत पर विश्व का सबसे मजबूत देश बनने जा रहा है। कह तो हमारे राजनेता और मीडिया भी रहे हैं कि हम विश्व की ताकत बनने जा रहे हैं। परन्तु फर्क यह है कि चीन उत्पादन के दम पर विश्व की ताकत बन रहा है और हम अपनी संख्या के आधार पर शोषणका सबसे बड़ा बाजार बनने वाले हैं।

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