>आजाद भारत की अजीब दास्तान

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ये कहां आ गए हम यूं ही साथ चलते-चलते
सिलसिला फिल्म में अमिताभ और रेखा जब यह गीत गायें, तब तक तो ठीक है, लेकिन भारत की सवा अरब जनशक्ति ऐसा समझे, तो गंभीर विषय बन जाता है। यूं ही साथ चलते-चलते! जी हाँ, यूं ही साथ चलते-चलते आज हम ऐसे मोड़ पर आ गये हैं, जब हमारा संविधान, हमारा कानून, हमारे संकल्प और हमारे सपने बेमाने से होने लगे हैं। आलोचना किसकी करें, कब तक करें? फिर भी 6 दशकों का हिसाब करके तो देखें। 
आजादी या विभाजन ? 
14 अगस्त 1947 की रात जाने कैसे कटी होगी? हालांकि भारत की अधिकांश जनसंख्या, जो दूर गाँवों में या पहाड़ों पर रहती थीं, इन सबसे बेखबर थी। फिर भी शहरों में रहने वाले या दिल्ली के आसपास के लोगों को 15 अगस्त की सुबह का बेसब्री से इंतजार था। सुबह हुई तो ऐसा लगा, जैसे उस दिन सांस भी पहली बार ले रहे थे। इतने वर्षों से समझाया जा रहा था कि हमारी समस्याओं की जड़ अंग्रेज हैं और वह जड़ कटी तो बीमारी खत्म। लेकिन दो दिन तक उछल कूद की ही थी कि रेडक्लिफ ने 17 अगस्त को भारत-पाकिस्तान की सीमा रेखा घोषित कर दी। लोग आजादी तो भूल गये और लग गये अपनी नई जमीन तलाशने। पंजाब और बंगाल, सिंध, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान आदि प्रांतों से हिन्दू-मुसलमान चल पड़े। जिन्ना-नेहरू के सपनों की भेंट चढ़े हजारों परिवार मारकाट के बीच इधर से उधर भाग रहे थे।
कुल डेढ़ करोड़ लोगों ने जगह बदली। 10 लाख मारे गये।

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