>राजस्थान सामान्य ज्ञान 2 Rajasthan GK

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Rajasthan GK (General Knowledge) राजस्थान का सामान्य ज्ञान विषय के अंतर्गत जून 2011 का नमूना प्रश्न पत्र

26.     भरतेश्वेर बाहुबलि घोर (1168 ई.) राजस्थानी भाषा का सबसे प्राचीन जैन ग्रन्थ है, जिसमें भरतेश्वर और बाहुबलि के बीच हुए घोर युद्ध का वर्णन है। इसके लेखक कौन थे ?
          (1) विजयसेन सूरि        (2) जिनदत्त सूरि                    (3) पल्हण                 (4) ब्रजसेन सूरि

27.     15वीं शताब्दी के अध्ययन का यह ग्रन्थ प्रमुख साधन है। इसमें वास्तुकला का वर्णन है और यह कुम्भा के प्रमुख शिल्पी मंडन द्वारा लिखा गया था।  कौन सा ग्रन्थ है ?
          (1) राज रत्नाकर          (2) राज वल्लभ           (3) अमर सार             (4) प्रबंध चिंतामणि
                       

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>राजस्थान सामान्य ज्ञान 1 Rajasthan GK

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Rajasthan General Knowledge राजस्थान का सामान्य ज्ञान विषय के अंतर्गत जून 2011 का नमूना प्रश्न पत्र 

1.       ए.जी.जी. राजस्थान में अँग्रेज़ी राज के प्रतिनिधि हुआ करते थे। उनका कार्यालय प्रारम्भ में अजमेर में था, जिसे माउन्ट आबू में इस वर्ष स्थानान्तरित कर दिया गया था।
          (1) 1835                  (2) 1856                            (3) 1889                            (4) 1902
                    
2.       बिजोलिया की तरह बेगूं क्षेत्र में भी किसान आंदोलन काफी प्रभावी रहा था। यहां के गोविन्दपुरा गांव में हुए गोलीकांड में दो किसान शहीद हुए थे। यह गोली कांड किस वर्ष हुआ था?
          (1) 1923                  (2) 1913                            (3) 1925                            (4) 1935
                    

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>दिल्ली का ड्रामा

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मेरे एक पहचान वाले सरकारी डॉक्टर फोन करते हैं और कहते हैं कि हम सबको बाबा रामदेव का समर्थन करना चाहिये। ये महाशय, डॉक्टर साहब, अस्पताल कम ही जाते हैं, यह मैं जानता हूँ। मुफ्त की तनख्वाह उठाते हैं। लेकिन भ्रष्टाचार को लेकर परेशान है। तभी एक कपड़ा व्यापारी मुझे सलाह देते हैं कि मैं बाबा के समर्थन में कूद पडूँ। मैं जानता हूँ कि यह व्यापारी महाशय सामाजिक क्षेत्र में दान-पुण्य करके प्रतिष्ठित हो गये हैं, परन्तु सरकार को टैक्स देने से इन्हें बड़ा परहेज है। कई ऐसे लोगों ने भी सम्पर्क किया, जिनके बारे में मुझे खबर है कि उन्होंने अपने परिवार को पालने के लिए भी जीवन में कोई सार्थक प्रयास नहीं किया, बस जैसे-वैसे जीवन जी रहे हैं।

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>शादियों पर फिजूलखर्ची – उत्सव बन गया अभिशाप

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घर में शादी का जिक्र आते ही सारा परिवार कभी चहकने लगता था। बूढ़े-जवान-बच्चे, सभी शादी में अपने-अपने हिस्से की खुशी ढूंढ़ने लगते थे। छ: महीने पहले ही गेहूँ साफ होने लगते थे, दर्ज़ी दो महीने पहले घर बैठ जाता था। बहन-बुआ, महीने भर पहले पीहर बुला ली जाती थी। 15 दिन पहले नाचना-गाना शुरू हो जाता था। रिश्तेदार-मोहल्ले वाले, गली को रंगमंच बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे। एक नितान्त पारिवारिक समारोह। अपनी संस्कृति में रंगा उत्सव।

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>अभिनव राजस्थान के बढ़ते कदम 4

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जैसे-जैसे 25 दिसम्बर की तारीख नजदीक आ रही है, तैयारियों को गति देने के प्रयास हो गये हैं। समाचार पत्र नियमित हो गया है। जून 2011 से दिसम्बर 2011 तक सात अंकों में सात विषयों पर हमारी रणनीति स्पष्ट होती जायेगी। पहली बार एक सकारात्मक कार्यक्रम को इतने बड़े स्तर पर आयोजित करना निश्चित रूप से एक बड़ी चुनौती है। परन्तु समय की माँग और हम सबकी मजबूत इच्छा शक्ति के चलते यह सम्भव भी लगने लगा है। अभियान का विचार अब राजस्थान के कोने-कोने में बैठे बुद्धिजीवी के पास पहुँच रहा है और उत्साह जनक प्रतिक्रियाएँ भी बराबर मिल रही हैं। सहयोग के लिए कई मित्रों ने कहा है। अनेक मित्रों ने समाचार पत्र के लिए मनीऑर्डर भी भेजे हैं। हालांकि हमने पहले भी कहा है कि आवश्यक धनराशि की व्यवस्था के लिए हमने कोचिंग क्लासेज चला रखी है और राजस्थान के सामान्य ज्ञान पर एक मौलिक व प्रामाणिक पुस्तक भी प्रकाशित करवाई है। फिर भी सहयोग एवं उत्साह वर्धन के लिए हम उनका आभार व्यक्त करते हैं।

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>मृत्युभोज : एक वीभत्स कुरीति

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यह लेख लिखते हुए शर्म महसूस हो रही है। कई बार ऐसा लगता है, अज्ञानता वरदान है। इग्रोरेन्स इज ब्लिस। लेकिन जाने अनजाने में कई चीज़ें ज्ञान के प्रकाश में आ जाती हैं और पीड़ा देती हैं। ऐसी ही एक पीड़ा देने वाली कुरीति है -मृत्युभोज। मानव विकास के रास्ते में यह गंदगी कैसे पनप गयी, समझ से परे है। जानवर भी अपने किसी साथी के मरने पर मिलकर वियोग प्रकट करते हैं, परन्तु यहाँ किसी व्यक्ति के मरने पर उसके साथी, सगे-सम्बन्धी भोज करते हैं। मिठाईयाँ खाते हैं। किसी घर में खुशी का मौका हो, तो समझ आता है कि मिठाई बनाकर, खिलाकर खुशी का इजहार करें, खुशी जाहिर करें। लेकिन किसी व्यक्ति के मरने पर मिठाईयाँ परोसी जायें, खाई जायें, इस शर्मनाक परम्परा को मानवता की किस श्रेणी में रखें।

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>अभिनव समाज – विकास की ज़मीन

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अभिनव राजस्थान के निर्माण के लिए हमने सात क्षेत्र महत्त्वपूर्ण माने हैं। इन्हें हमने विकास राग के सात सुर माने हैं, विकास के इंद्रधनुष के सात रंग माने हैं। ये हैं – समाज, शिक्षा, शासन, कृषि, उद्योग, प्रकृति और संस्कृति। इस अंक से हम क्रमश: एक-एक विषय पर चिंतन करेंगे। कार्ययोजना को सामने रखेंगे, जिस पर चलकर हम अपने उद्देश्य को पूरा कर सकें। ध्यान रहे, अभिनव राजस्थान अभियान में केवल आलोचना या चिंता को आधार नहीं बनाया जायेगा। प्रत्येक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र की मूल समस्या का हम विश्लेषण करेंगे, समस्या के निदान की व्यावहारिक कार्ययोजना पर विचार करेंगे और इस कार्ययोजना से लक्ष्य प्राप्त करने की विस्तृत रणनीति तैयार करेंगे।
हमारा पहला सुर, पहला रंग अभिनव समाज है। अलग-अलग चिंतक हमारी समस्याओं के समाधान के अलग-अलग समाधान बताते हैं। कोई शिक्षा को सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण मानता है, कोई भ्रष्टाचार के खात्मे को, तो किसी को चरित्र निर्माण में हल नजर आता है। हमारे शोध और अध्ययन में समाज में आवश्यक सुधार पहला महत्त्वपूर्ण कदम लगता है। समाज-सुधार किसी जमाने में सन्तों और सुधारकों ने देश की परम अवश्यकता बताया था, परन्तु अब यह दकियानूसी कार्य लगने लगा है। फैशनेबल नहीं रह गया है। अब शिक्षा को सबसे महत्त्वपूर्ण और आवश्यक क्षेत्र बताया गया है। शिक्षा को गाँव-गाँव फैला दो, समाज स्वत: सुधर जायेगा। जबकि वास्तविकता तो यह है कि ज्यों-ज्यों वर्तमान शिक्षा फैली है, समाज नई-नई कुरीतियों से घिरने लगा है। शिक्षितों ने दहेज प्रथा व भ्रूण हत्या से सामाजिक सम्बन्धों को जहरीला बना दिया है। ज्ञान व कला की जगह पद और धन का मूल्य बढ़ गया है। इसलिए हम कहते हैं-पहले समाज में कुछ आवश्यक परिवर्तन करो, तभी अन्य परिवर्तन फलदायी होंगे, सार्थक होंगे। वरन् परिवर्तनों से उल्टा नुकसान ही होगा।

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>मेरी आवाज सुनो

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नक्कारखाने में तूतियों की आवाज़ -राजस्थान के किसान, कारीगर, अध्यापक और व्यापारी
मैं राजस्थान का किसान हूँ।
कृषि वैज्ञानिक कहते हैं कि एक बीघा में 1 लाख रुपये की पैदावार कम पानी, कम वर्षा में भी हो सकती है। वे राजस्थान जैसे भूगोल वाले इजराइल देश का उदाहरण भी देते हैं। यही नहीं मेरे नाम से कई सफेद वस्त्रधारी इजराइल घूमकर भी आ गये हैं। वापिस आकर वे कौनसे खेतों में गये हैं, किसी को नहीं पता। इधर मेरा परिवार केवल गुजर-बसर कर रहा है। नेता भी कहते हैं कि खेती घाटे का धंधा है। बच्चों को खेती नहीं सिखाओ, उन्हें पढ़ाओ, ताकि खेती से पीछा छूटे। मैं उनके झाँसे में आ गया हूँ। बच्चों को पढ़ा रहा हूँ। लेकिन यह क्या? पढ़े-लिखे बच्चों को भी तो रोजगार नहीं मिल रहा है। अब वे खेती भी नहीं करना चाहते हैं। कहाँ फंस गया हूँ मैं?

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>देश किस ओर ? अराजकता या नवनिर्माण ?

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आज मूल प्रश्र यही है, जिस पर गम्भीरता से मंथन-चिंतन होना चाहिये। हल्की-फुल्की-छिछली बातों से ऊपर उठकर इस पर विचार करना चाहिये, कि आखिर आज के हालतों को देखते हुए भारत किस तरफ जा रहा है। क्या हम वाकई में एक विश्वशक्ति बनने जा रहे हैं या हमने ठगने के लिए ही यह बात विकसित देश कह रहे हैं? क्या हम फिर से शोषण को तैयार बाजार बनाने की दिशा में बढ़ रहे हैं? क्या हमें नहीं लगता कि हम विकसित देशों की फैक्ट्रियों के लिए आवश्यक जमीन, कच्चा माल और मजदूर उपलब्ध कराने में लगे हैं और उनके उत्पादों, उनकी वस्तुओं के लिए ग्राहक जुटाने में लगे हैं? क्या इसी को हम ऊँची विकास दर कहकर जनता को भुलावे में रख रहे हैं ?

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>थूं बोल तो सरी, जुबान खोल तो सरी

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आँखों में सुनहरे सपने नहीं तैरते हैं, बस सब कुछ सड़ा गला दिखाई देता है। संवेदना और आंख का सम्बन्ध टूट गया है। आंसू केवल अपने नुकसान पर निकलते हैं, परायी पीड़ पर नहीं बहते। कान अविश्वास से भर गये हैं। अपनी प्रशंसा सुनने को आतुर रहते हैं, परन्तु किसी ओर की उपलब्धि से कान के पर्दे झलने लगते हैं। चेहरा मुरझा गया है, झुर्रियों से भर गया है, बेरौनक़ हो गया है। चिन्ता चेहरे पर स्थायी रूप से बस गयी है। हँसने से कभी पेट में दर्द होता था, अब चेहरा दुखता है। सिर गुलामी में झुका रहता है, कभी नेता या अफसर या कभी धनी के सामने, तो कभी किसी गेरुआ या हरे वस्त्रधारी के सामने। इस झुकने में कहीं श्रद्धा नहीं। केवल दिखावा, डर या आत्मविश्वास में कमी झलकती है। हाथों ने लिखना छोड़ दिया है। हस्ताक्षर से, दस्तखत से अधिक लिखने की आदत ही नहीं रही। लिखें भी कैसे, संवेदना के बिना। संवेदना के बिना लिखा असर भी तो नहीं करता। पढ़े-लिखे हैं, परन्तु गम्भीर विषयों को पढऩे से बचते हैं, उबासी आ जाती है। जीभ का मतलब स्वाद रह गया है। दिन भर मसाले-मिठाईयाँ चाटती रहती है। कभी घर में, तो कभी किसी जान पहचान वाले के पांडाल में। बोलती है तो केवल निन्दा से भरकर, शिकायत से भरकर। पैरों को लकवा मार गया है। घर से बाहर निकलने के लायक नहीं रह गये हैं। घर में बैठे-बैठे चिल्लाते रहते हैं, अरे! जाओ और मेरे लिए आराम का प्रबन्ध करो, व्यवस्था को ठीक करो। जाए कौन? लकवा सबको हो गया है।

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